बाहर से घर में आते समय, भोजेन करने के पहले बुजुर्ग लोग हाथ पैर मुह धोने का आदेश देते है।
क्यों ?
हमारे शरीर में एक विद्युत् ऊर्जा सदा प्रवाहित होती रहती है जब तक शारीर में प्राण है। यह विद्युत् ऊर्जा सर से लेकर पैर की ओर निरंतर बहती है। इससे ही हमारा शरीर गर्म ऊर्जावान रहता है और शरीर के चारो तरफ ऊर्जा का एक सुरक्षा चक्र बना रहता है। हाथ की हथेलियों, पैर के तलवो से अतिरिक्त ऊर्जा या गर्मी स्पष्ट रूप से बाहर निकलती रहती है।
घूमने फिरने, यात्रा आदि से शरीर में गर्मी बढ़ जाती है, शारीर का आभामण्डल प्रभावित होता है। जिसको व्यवस्थित करना आवश्यक होता है, अन्यथा लम्बे समय तक ये उर्जामण्डल गड़बड़ रहेगा तो सरदर्द, खिन्नता, शरीर में अजीब अटपटा सा लगने लगता है, शारीर बीमार हो जाता है।
तो इस उर्जामण्डल को, विद्युत् के आंतरिक संचालन को सही रखने के लिये हाथ पैर धोने का नियम बनाया गया है।
पानी विद्युत् का सर्वश्रेष्ठ सुचालक है और केवल संपर्क में आने से ही ये शारीर की गर्मी को तुरंत ग्रहण कर लेता है जिससे अतिरिक्त गर्मी शारीर से बाहर हो जाती है।
तो बाहर से घूमकर आने पर हाथ पैर मुह धोने से बाहरी धूल आदि दूषित पदार्थ ख़त्म होते है, शारीर की ऊर्जा व्यवस्थित सामान्य हो जाती है।
भोजेन के पहले हाथ पैर धोने से हमारे शरीर की ऊर्जा व्यवस्थित हो जाती है, ताकि भोजेन पचाने हेतु ऊर्जा ठीक से काम करे।
यदि भोजेन करते समय शारीर की ऊर्जा अव्यवस्थित है तो भोजेन ठीक से नहीं पचेगा, अपच होगा, गैस बनेगी।
एक परेशान आदमी को नहाने के बाद इसीलिये अच्छा लगता है क्योंकि सर से पैर तक् उसका उर्जामण्डल व्यवस्थित हो जाता है। हमारे शारीर का उर्जामंडल व्यवस्थित रहे, हम सदा स्वस्थ रहे इसलिये दिन में एक या 2 बार नहाते है और समय समय पर हाथपैर, मुह आदि धोते रहते है।
हमारे प्राचीन ऋषियों की खोज है ये स्नान, प्रक्षालन विज्ञान प्रक्रिया
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